Sunday, 29 October 2017

क्यों है..

गला रुंध है, आवाज़ भारी क्यों है ,
चेहरे पर ये लाचारी क्यों है ,

आँखो ने तो सबकुछ कर ही दिया बयाँ ,
फिर बातों में दुनियादारी क्यों है.

अब तो आकाश भी चूमता है निशाँ, उसके कदमों के,
फिर धरती पर वो बेचारी क्यों हैं .

सुना है हमारे सूरज का रुतबा है, आसमाँ में बहुत
फिर देश में इतनी बेरोज़गारी क्यों है .

अभी-अभी तो माँगी हैं, दुआएँ अमन की,
फिर ज़ंग की ये तैयारी क्यों है .

दुश्मन ही सूत्रधार हैं जब, साज़िश के मेरे क़त्ल की,
फिर दोस्त इतने आभारी क्यों हैं .

इन उपद्रवी परिंदों पर तो कोई जारी नहीं करता, फ़तवे,
फिर ज़िंदगी मुश्किल हमारी क्यों है .

-आदर्श जैन

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