Saturday, 11 September 2021

ऐसी वैसी बातों...


ऐसी वैसी बातों से क्या होना है,
संबंधों का ही चाहे बुरा होना है,

रोते रोते जग में आंखें खोली थीं,
रोते रोते ही जग से विदा होना है।

पगले! सोच लिया फिर घबराना कैसा,
अंधेरा आगे और घना होना है।

फिर तो बर्बादी भी अपनी निश्चित है,
बस काबिल होकर हमको गुमां होना है।

तुमसे हमको केवल दोस्ती करनी है,
पर उससे पहले तुम्हें खुदा होना है।

क्या होना है आखिर सब पढ़ लेने से,
कुछ भी न जाना बस ये पता होना है।

तुम्हारी ही नज़रों से दुनिया देखी है,
तुम्हारी ही आंखों में फ़ना होना है।

- आदर्श जैन

Thursday, 1 April 2021

कोई जो देखता है...

 

कोई जो देखता है तो देखकर हैरां रह जाता है,

हर सम्त बरसता है बादल पर सहरा, रह जाता है,


क्या सारी शक्लें सारी सूरत इक जैसी होती हैं?

या बसकर इन आंखों में, तेरा चेहरा रह जाता है।


कोई बंदिश या पाबंदी  इश्क़ को  रोक नहीं पाती,

आशिक़ भाग ही जाते हैं अक्सर, पहरा रह जाता है।


अच्छा ही है कि छलक जाए नयनों तक आई पीड़ा,

क्यूंकि लहू बन जाता है आंसू, गर ठहरा रह जाता है।


होली में कोई पक्का रंग बहुत देर नहीं टिकता,

बस लाल गुलाल लगाया उनका गहरा रह जाता है।


- आदर्श जैन

Saturday, 12 December 2020

जब जीवन में कुछ....

 
जब जीवन में कुछ अच्छा करने लगता हूँ,
अपनी फितरत से धोखा करने लगता हूँ,

अव्वल सबका झगड़ा सुलझाने जाता हूँ,
फिर खुद ही सबसे झगड़ा करने लगता हूँ। 

हर काम अधूरा करने की कैसी ज़िद है,
एक नहीं होता, अगला करने लगता हूँ।

पहले ख्वाबों के चित्र, रंगीन बनाता हूँ,
फिर धीरे धीरे धुँधला करने लगता हूँ।

दूर कभी कुछ यादों से भागा करता हूँ,
फिर खुद ही उनका पीछा करने लगता हूँ।

बाल सँवारने की कुछ तो मेरी आदत है,
कुछ तुमसे मिलकर ज़्यादा करने लगता हूँ।

- आदर्श जैन

Sunday, 21 June 2020

जीवन तेरी शर्तों में..

जैसे बीतीं सारी विपदा,
ये संकट भी टल जाएंगे,
जीवन तेरी शर्तों में हम,
ढलते ढलते ढल जाएंगे।

आंधी में इस बार कि माना,
सब टूट गए घर संबल के,
नूर भरी कुछ आंखों में भी,
कैसे भीषण सपने झलके,
जब जब सिसकी धरती पहले,
नभ ने रोकर प्यास बुझाई,
लगता है अब सारे आंसू,
जैसे सूख गए हैं बादल के।

निश्चित है इस मुश्किल में भी,
रहकर सहज निकल जाएंगे,
जीवन तेरी शर्तों में हम,
ढलते ढलते ढल जाएंगे।

भावी जीवन अस्थिर है और,
घाव हरे हैं सब यादों के,
कटुता के प्रतिनिधि बतलाते,
हैं अर्थ मधुर संवादों के।
घोर निराशा मन में बैठी,
चारों ओर तिमिर दिखता है,
नामुमकिन है भाव समझना,
मुस्कान निमित अवसादों के।

पर सूरज की संताने हैं,
अंधियारों में पल जाएंगे,
जीवन तेरी शर्तों में हम,
ढलते ढलते ढल जाएंगे।

जहर घुला है हर मौसम में ,
धरती भी हमसे रूठी है,
भय पसरा है हर आंगन में,
और चाल प्रकृति की टूटी है,
बर्बादी की सारी खबरें,
सारी ही अटकल सच्ची हैं,
जो जीवन को आस दिलाती,
बात वही बस इक झूठी है।

ज़ख्मी कुदरत के घावों पर,
मिलकर मरहम मल जाएंगे,
जीवन तेरी शर्तों में हम,
ढलते ढलते ढल जाएंगे।

- आदर्श जैन

Monday, 25 May 2020

पाँव जीवित थे हमारे...


राह वो मुश्किल बड़ी थी,
आपदा सम्मुख खड़ी थी,
हम मगर चलते रहे थे,
दर्द को छलते रहे थे।

सोचकर अब से हसेंगे,
क्रूर किस्मत के सितारे,
प्राण भी जब मर चुके थे,
पाँव जीवित थे हमारे।

शहर से इक भोर उठकर,
आ गए थे हम सड़क पर,
वेदना, पीड़ा, उपेक्षा,
और लेकर गम सड़क पर,
उम्र भर की साधना का,
सोचते क्या फल मिला था,
भूख से बच्चे हमारे,
तोड़ते थे दम सड़क पर।

लाद जीवन बोझ सर पर,
हम खड़े आशा किनारे,
प्राण भी जब मर चुके थे,
पाँव जीवित थे हमारे।

कौन सुनता याचनाएं,
शोक सुनने कौन बैठे,
सब सियासी लोभ पाले,
रोटियां खा मौन बैठे,
डूब जाने से उचित था,
सांस थामे युद्ध करना,
देखते इकलव्य को पर,
मूक बनकर द्रोण बैठे।

हौंसला लेकर उठे थे,
कर्म कौशल के सहारे,
प्राण भी जब मर चुके थे,
पाँव जीवित थे हमारे।

- आदर्श जैन

Sunday, 26 April 2020

उदास रहा जाए...

क्यूँ ओढ़कर सदा झूठा लिबास रहा जाए,
उदासी का दौर है, क्यूँ न उदास रहा जाए,

न कोई मजलिस, न दुनिया, न शोर शराबा,
अपनी खातिर सही, अपने पास रहा जाए।

बुझ गई फिर कैसा मकसद, किसकी चाह,
मज़ा तो है जब जलती हुई प्यास रहा जाए।

मारते - मारते चोंच, कभी तो टूटेंगी सलाखें,
क़फ़स में किसी परिंदे का विश्वास रहा जाए।

रहकर अजनबी भी निभाये जाते हैं ताल्लुक़,
हमदर्दी होने ज़रूरी नहीं कि खास रहा जाए।

क्यूँ चाहते हो भरा होना, हवा से या पानी से,
क्या बुरा है कि अगर खाली गिलास रहा जाए।

 
- आदर्श जैन

Saturday, 4 April 2020

ऐ कबूतर! तेरे हाथों...

ऐ कबूतर, तेरे हाथों खुदा को पैग़ाम करना हैं,
ये कैद से हमें आज़ाद करे, हमें काम करना है,

नींद आती है तो अब, बेचैनी से जाग उठते हैं,
हम जो कहते थे ज़िंदगी भर आराम करना है।

एक बात ये कि अगले पल का भी ऐतबार नहीं,
एक बात और कि सालों का इंतजाम करना है।

सुनते हैं कुदरत की नाराज़गी का कहर टूटा है,
बुजुर्गों की बातों का अब से एहतराम करना है।

लादकर जो ख्वाबों को कंधों पर, चले जा रहे हैं,
सारी मंजिलें हीं उन मुसाफिरों के नाम करना है।

ऐसे वक्त में भी जो बनकर ढाल, सामने खड़े हैं,
ऐसे फौलादियों को खड़े होकर सलाम करना है।

- आदर्श जैन

शक्कर हैं!

बातें उसकी बात नही हैं, शक्कर हैं। सोच उसे जो गज़ल कही हैं, शक्कर हैं। बाकी दुनिया की सब यादें फीकी हैं, उसके संग जो याद रही हैं, शक्कर हैं।...