Monday, 23 December 2019

Equilibrium

एक गुस्से की उम्र कितनी होती है,
अधिकतम कितनी देर तक,
किया जा सकता है क्रोध,
लगातार कितना आक्रोशित रह सकते हैं आप,
कितनी देर तक खो सकते हैं,
अपना आपा, अपना बोध।
अगर नफरत की अग्नि का हो अभाव,
किसी बाहरी भड़कावे का न हो दबाव,
तो यकीन मानिए,
अधिक देर न टिक सकेंगे इस व्यवस्था में,
वापस लौट आयेंगे अपनी मूल अवस्था में,
जैसे अग्नि के अभाव में,
शीतलता में लौट आता है गरम जल,
जैसे दबाव के न होने पर,
पुनः शिथिल हो जाती है तनी रबर।
जैसे संसार की हरेक असंतुलित वस्तु,
चाहती है लौटना अपने Equilibrium में,
वैसे ही लौट आना चाहेंगे आप,
अपने स्वभाव में,
प्रेम में, सौहार्द में, अमन में।
हो सकता है आप,
अभी न समझ पाएं ये बात,
क्यूंकि अभी आप गुस्से में हैं,
और गुस्से में विवेक मर जाता है।।

- आदर्श जैन

Saturday, 30 November 2019

मैं तो तुमसे कह देता हूं...

खयालों के पशोपेश में उलझीं बेचैन अंधेरी रातों को,
कल्पनाओं के अर्थ ढूंढ़तीं निरर्थक मन की बातों को,
कहते कहते जो कह न पाया अधूरे उन जज़्बातों को,
सफल रणनीतियों की सारी, असफल मुलाकातों को,

इतनी सरलता से कैसे तुम, अपने में सहती होगी ।
मैं तो तुमसे कह देता हूं, तुम किससे कहती होगी ।

भीतर की खामोशियों को, बाहर के तमाम शोरों को,
चाहत के समंदर में उठतीं उमंगों की नई हिलोरों को,
रिश्तों का संतुलन साधे, भरोसे की नाजुक डोरों को,
सूर्य की रोशनी से वंचित, जाड़े की अभागी भोरों को,

सुनकर तुम्हारी भी कभी, क्या आंख बहती होगी।
मैं तो तुमसे कह देता हूं, तुम किससे कहती होगी।

जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे, इंद्रधनुष के रंगों को,
मन की रणभूमि पर स्वयं से ही, लड़ी सारी जंगों को,
निराशा में गोते लगातीं, उम्मीदों की कटी पतंगों को,
जनता के विश्वास को छलते, बेढंगे सियासी ढंगों को,

सहेज कर अंतर में अपने, कैसे मौन रहती होगी,
मैं तो तुमसे कह देता हूं, तुम किससे कहती होगी।

- आदर्श जैन

Friday, 29 November 2019

इल्हाम

मुझे सही सही तो नहीं पता,
कि कैसी होती होगी 'मौत',
पर शायद,
इस शब्द से बेखबर,
किसी नदी के,
सागर में समा जाने जैसी होती होगी 'मौत'।
देह मिल जाती होगी अपनी 'नियति' में,
मगर आज़ाद रहती होगी,
'आत्मा'।

मुझे सही सही तो नहीं पता,
कि कैसी होती होगी 'आत्मा',
पर शायद,
किसी स्वच्छंद पंछी के,
आकाश में उड़ने जैसी होती होगी 'आत्मा'।
चाहती होगी परमसत्य में विलीन होना,
मगर धरा पर लौट आती होगी ढूंढ़ने,
'इल्हाम'।

मुझे सही सही तो नहीं पता,
कि कैसा होता होगा 'इल्हाम',
पर शायद,
तेल खत्म हो जाने के बाद भी,
किसी दिए में,
प्रकाश के रहने जैसा होता होगा 'इल्हाम'।
और फिर न कभी मौत होती होगी,
न होती होगी कभी,
धरा पर लौटने की,
'आवश्यकता'।

इल्हाम -> enlightenment

- आदर्श जैन

Friday, 15 November 2019

मुश्किल सरल हो सकती है...

मात्र मुस्कुराकर मुश्किल सरल हो सकती है,
कीचड़ बीच भी ज़िंदगी, कमल हो सकती है,

बेशक रो लेना हालातों पर, मगर फिर सोचो,
उदासी भी क्या उदासी का हल हो सकती है।

हारकर बैठने से तो यकीनन, कुछ नहीं होगा,
कोशिश करके कोशिश, सफल हो सकती है।

संघर्ष के दिनों की तो, रातें भी गज़ब होती हैं,
इक नींद तक सपनों में, खलल हो सकती है।

कुछ भी कर लो चाहे, कुछ तो कहेगी दुनिया,
ख़बरदार ये दुनिया क्यूंकि, छल हो सकती है।

तुम ध्यान से सुनते रहे तो मैं भी सुनाता रहा,
मुझे लगा ही नहीं था कि गज़ल हो सकती है।

- आदर्श जैन

Monday, 14 October 2019

गा रही है चांदनी...

दरमियां सारे फासले, मिटा रही है चांदनी,
चांद लिख रहा है 'प्रेम' , गा रही है चांदनी,

सच देखेगी तो सच से डर जाएगी दुनिया,
दाग़ चंद के इसलिए छिपा रही है चांदनी।

अंधेरे से न टकराकर, गिर पड़ें नन्हें सितारे,
आसमां में इक चांदनी, बिछा रही है चांदनी।

रातभर जलकर थके उन दीपकों की खातिर
नई सुबह को फिर बुलाने, जा रही है चांदनी।

तुम्हारी आंखों को सब यहां, देख रहे हैं ऐसे,
तुम्हारी आंखों से ही जैसे, आ रही है चांदनी।

- आदर्श जैन

Saturday, 12 October 2019

भौकाल तुम्हारे भाई का

तीन लोकों में मचा हुआ है, बवाल तुम्हारे भाई का,
तुम तो जानते ही हो यार, भौकाल तुम्हारे भाई का।

भूत, प्रेत, दानव, राक्षस, सब तुम्हारे भाई से डरते हैं,
कई असुर तो तुम्हारे भाई के फ्रिज की बोतलें भरते हैं।
तुम्हारा भाई हंसता है तो ऊपर सितारे ज़िंदा रहते है,
तुम्हारे भाई के रोने को दुनियावाले बरसात कहते हैं।
चांद और सूरज करते हैं चौकीदारी तुम्हारे भाई की,
निभाते हैं ये सुरक्षा की जिम्मेदारी तुम्हारे भाई की।
एक इशारे में चलते वक़्त के क़दम बदल देता है,
तुम्हारा भाई टीवी के रिमोट से मौसम बदल देता है।
भगवान फोन करके पूछता है हाल तुम्हारे भाई का,
तुम तो जानते ही हो यार, भौकाल तुम्हारे भाई का।

जुगनुओं के हाथों में तुम्हारे भाई के नाम के पर्चे हैं,
अप्सराओं की महफ़िल में तुम्हारे भाई के ही चर्चे हैं।
स्वर्ग की हरेक परी तुम्हारे भाई को उड़ के देखती है,
सड़क पर हर सुंदरी तुम्हारे भाई को मुड़ के देखती है
हर लड़की करती है मन में ख्वाहिश तुम्हारे भाई की,
कायनात में सबको ही है फरमाइश तुम्हारे भाई की।
चींटियां हो जाती है लट्टू जैसे किसी मिठाई पर,
ऐसे कन्याओं की माएं तक लट्टू है तुम्हारे भाई पर।
किस किस की मांग भरे, है सवाल तुम्हारे भाई का,
तुम तो जानते ही हो यार, भौकाल तुम्हारे भाई का।

पहले ही पेज पर छपता है हर रोज़ अख़बारों में,
हर क्षेत्र में झंडे गाड़े हैं तुम्हारे भाई के रिश्तेदारों ने।
तैरकर समंदर पार किया है तुम्हारे भाई के मामा ने,
देवों तक को उधार दिया है तुम्हारे भाई के नाना ने।
तुम्हारे भाई के चाचा पूरी फौज़ से अकेले जीते थे,
तुम्हारे भाई के पापा के संग खेले शेर और चीते थे।
तुम्हारे भाई के एक फूफा को सारा ज्ञान हासिल था,
ब्रह्मांड की खोज में तुम्हारे भाई का ताऊ शामिल था।
हर कोई हैरान है देखकर, कमाल तुम्हारे भाई का,
तुम तो जानते ही हो यार, भौकाल तुम्हारे भाई का।

- आदर्श जैन

Friday, 11 October 2019

नया तरीका खोज लिया मैंने...

इस अफ्साने का भी अंजाम सोच लिया मैंने,
छलकने से पहले आंखों को पोंछ लिया मैंने,

मैं एक ख्वाब को हकीकत मानने ही वाला था,
ठीक हुआ जो नींद में खुद को नोंच लिया मैंने।

मुझे याद नहीं तुम्हारा दिया ज़ख्म कौनसा था,
इसीलिए सारे ज़ख्मों को ही खरोंच लिया मैंने।

ज़ुबां खोलता तो बात खामखां और बढ़ जाती,
शिकवे बहुत थे पर होठों को दबोच लिया मैंने।

बिना उलझनों के तो ज़िंदगी बेरंग हो चली थी,
उलझने को फिर नया तरीका खोज लिया मैंने।

- आदर्श जैन

शक्कर हैं!

बातें उसकी बात नही हैं, शक्कर हैं। सोच उसे जो गज़ल कही हैं, शक्कर हैं। बाकी दुनिया की सब यादें फीकी हैं, उसके संग जो याद रही हैं, शक्कर हैं।...