Friday, 20 September 2019

किसका फोन आता है..

कहां रहता है ध्यान तेरा, खुद से क्या बुदबुदाता है,
ये बिन बताए आजकल तू किससे मिलने जाता है,

कितना भी छिपा लूं इश्क़ मगर मां पूछ ही लेती है,
कौन है वो लड़की, बार बार किसका फोन आता है।

दिमाग कहता है कि तुम्हारा कोई ख़याल ना लाऊं,
दिमाग की सुनते ही जाने क्यूं ये दिल बैठ जाता है।

जाने कैसे लोग इस शहर में शब-ए-हिज्र काटते होंगे,
शुक्र है मेरा दिल मुझे वस्ल की कहानियां सुनाता है।

-Adarsh Jain

Monday, 9 September 2019

हर रस्ता मुश्किल लगता है...

कंधों पर उम्मीदों का बस्ता बोझिल लगता है,
चलने से पहले तो हर रस्ता मुश्किल लगता है,

प्रतिकूल लहरों पर जब सवार सांसे चलती हैं,
लाख दूरी होकर भी करीब साहिल लगता है।

चंद क्षणिक हारों से इतने भी नाउम्मीद ना हो,
तुमसे ही देश का रोशन मुस्तकबिल लगता है।

तुम्हारी तरह ही हूबहू मुझसे झगड़ा करता है,
कोई तो है मुझमें जो तुममें शामिल लगता है।

मर्द कहकर खुद को औरत पर हाथ उठाता है,
कोई भी हो पर मुझको, वो बुझदिल लगता है।

लक्ष्य से वो मुझको अक्सर भटकाता रहता है,
ये मन मुझे अपने सपनों का कातिल लगता है।

-आदर्श जैन

कहानी लेकर आए हो...

होठों पर चुप्पी, आंखों में पानी लेकर आए हो,
तुम आज फिर चेहरे पर हैरानी लेकर आए हो

अबतक सुनाए हुए तुम्हारे सारे किस्से झूठे थे,
सच बोलो न फिर कोई कहानी लेकर आए हो।

इस बाज़ार में तो चालाकी के सिक्के चलते हैं,
तुम बड़े नादान हो जो नादानी लेकर आए हो।

जूझते हुए जब मुश्किलों से काट दी है पूरी उम्र,
तब कहते हो कि थोड़ी, आसानी लेकर आए हो।

प्यासी थी जब ये धरती तब तुम कहां थे, बादल!
बाढ़ आयी है अब तो पूरी रवानी लेकर आए हो।

वही सुकून खोजते कई पीढ़ियां हुई हैं रुखसत,
जिसे खोजने तुम पूरी जिंदगानी लेकर आए हो।

- आदर्श जैन

Sunday, 1 September 2019

चार लोग

कहीं दूर देश चला गया है,
या फिर रब से ही राब्ता हो गया है,
'चार लोग क्या कहेंगे' की टोली का एक सदस्य,
आज अचानक ही लापता हो गया है।
उसे ढूंढने की खातिर बाकी 'तीन' लोगों ने,
मदद के लिए हाथ उठाए हैं,
और उसकी सभी विशेषताओं के साथ,
उसके पोस्टर पूरे शहर में लगवाए हैं।
तो चलिए इस मुहिम में,
मैं भी अपना फर्ज़ निभाता हूं,
उसकी कुछ शारीरिक एवं चारित्रिक विशेषताएं,
आपको भी बताता हूं।

वो आते जाते लोगों से अक्सर,
फिजूल सवाल करता है,
दिखने में सामान्य है,
पर कई दफा रंग बदलता है।
आंख- कान बिल्कुल चौकन्ने,
और नाक औसत से बड़ी है,
वो बेवजह समय पूछ लेता है,
भले उसके हाथ में भी घड़ी है।
उंगलियां थोड़ी लम्बी हैं,
शायद आपने भी पहचानी हों,
दूसरों की ज़िंदगी में ताकि,
हस्तक्षेप करने में आसानी हो।
अंदर से बेहद चंट है,
मगर दिखने में भोला होगा,
साधारण आंखों से नहीं दिखेगा
पर कांधे पे उसके झोला होगा।
उस झोले में उसने,
कई किताबें भर रखीं हैं,
दुनियाभर के लोगों की उनमें,
'चुगलियां' जमा कर रखीं हैं।
वो भोजन नहीं करता,
बस बातों से ही पेट भर लेता है।
खबरदार रहें,
क्यूंकि किसी भी अंजान व्यक्ति से वो,
किसी की भी चुगली कर देता है।
जैसे,
"फलाने घर में प्रॉपर्टी को लेकर,
दोनों भाइयों में ही टक्कर है,
पता है वो पड़ोस वाली बिजली का,
उस बादल के साथ चक्कर है।
देखा वो कॉलोनी की नई लड़की के,
कपड़े कितने छोटे हैं।
सुना है वो धनीराम ब्याज में डूबा है,
अरे, उसके तो धंधे ही खोटे हैं।
और वो भागचंद का भी,
तो नया धंधा नहीं चला,
अब तुम्हीं बताओ यार,
'मॉडलिंग' भी कोई पेशा है भला।
जब से संतोष की शादी हुई है,
उसके घर में ही रहता उसका साला है,
मुझे तो लगता है यार,
कि दाल में ही कुछ काला है।
अरे एक वो शर्माजी का बेटा है,
जो अमेरिका में नौकरी करता है,
एक अपने वर्माजी का पप्पू है,
जो घर में ही खर्राटे भरता है,
सुना है कि कमलेश 'ड्रग्स' बेचता है,
तभी पुलिस को उसकी तलाश रहती है,
'26' की हो गई है चौबेजी की 'कम्मो',
बताओ अब तक घर में बैठी है।"

इस तरह के किसी व्यक्ति से अगर आप,
बस, ट्रेन या किसी सार्वजनिक स्थान पर मिल जाएं,
तो कृपया करके हमें ना बताएं।
आप चार दूसरे लोगों को बताएं,
वे और चार लोगों को बताएंगे,
बस इसी तरीके से हम,
उसका पता जानना चाहेंगे।

हमारी मदद करने वालों का,
'अखिल विश्व चार लोग क्या कहेंगे महासंघ' द्वारा,
एक इंटरव्यू लिया जाएगा,
और जिसकी भी चुगलियों में दम होगा,
उसे इस समिति में शामिल होने का,
एक मौका दिया जाएगा।
तो आप भी शुरू कर दीजिए उसे ढूंढ़ना,
हो सकता है आपकी तकदीर में ही,
कोई कमल खिल जाए,
और ऐसे ख्यातिप्राप्त संस्थान में,
शामिल होने का सुनहरा मौका,
क्या पता आपको ही मिल जाए।

- आदर्श जैन

Thursday, 29 August 2019

घड़ी


उजाले के शोर में तो सुनाई नहीं देती,
पर रात की खामोशी में गुनगुनाती है।
सोचा है कभी,
कि दीवार पर लगी ये घड़ी,
आखिर क्या कहना चाहती है।
इन सुइयों की टिक टिक में,
ज़रूर, कोई तो राज़ है।
मुझे तो लगता है, ये मेरे
अस्तित्व की ही आवाज़ है।
वो 'सेकंड' की सुई जो भाग रही है तेज़ी से,
मुझे अपने संघर्षों जैसी लगती है,
हर लम्हा आगे बढ़ती हुई,
बाकी सबसे बेखबर,
अपनी धुन में चलती है।
और वो धीमी चलती हुई 'घंटे' की सुई,
शायद मेरे सपनों को दर्शाती है,
समय के चक्र पर रेंगते हुए,
हर बार सेकंड की सुई से टकराती है।
सबके बीच है ज़िन्दगी मेरी,
जो 'मिनट' की सुई की भांति है,
बाकी दोनों सुइयों के बीच किसी तरह,
बस सामंजस्य बैठाती है।
मैं सोचता हूं,
एक उम्र बाद जब ये घड़ी बंद होती होगी,
तो सबसे पहले क्या मरता होगा?
जीवन, संघर्ष या सपने!

- आदर्श जैन

Tuesday, 27 August 2019

हाथ मिलाया जाता है..

दाने फेंके जाते हैं फिर जाल बिछाया जाता है,
मासूम परिंदों को यहां ऐसे ही फंसाया जाता है,

इस शहर में आए हो तो ये दस्तूर भी जान लो,
यहां कत्ल से पहले भी हाथ मिलाया जाता है।

शायद हैरत हो जानकर तुम्हें पर इस मुल्क में,
प्रेम पूजा जाता है मगर इश्क़ छिपाया जाता है।

भले सड़क नहीं है गांव में मेरे पर इतना तो है,
हर जाते मुसाफिर को पानी पिलाया जाता है।

क्या कहा था तुमने कि अब से भुला दोगे मुझे,
क्या तुमसे कभी कोई वादा निभाया जाता है।

निकालकर दिल से मुझे क्यूं मेरी यादें रखी हैं,
वक़्त के बटुए से मेरा बेकार किराया जाता है।

- आदर्श जैन

Sunday, 18 August 2019

तरक्की

इस कुदरत की दास्तां है ये,
मेरे तस्सवुर की कहानी नहीं,
कहते हैं सदियों पहले,
एक जंगल था यहीं कहीं।
एक चिड़िया थी जो किसी पेड़ पर,
घोंसला बना कर रहती थी,
जीवन का काफी शोर था यहां,
एक नदी बगल से बहती थी।
उस चिड़िया ने सोचा एक दिन,
चलो दुनिया घूम कर आते हैं,
ये जंगल कितना छोटा है,
चलो चांद चूम कर आते हैं।
फिर ऐसी ऊंची उसने उड़ान भरी,
कि निशां गगन में खोते गए,
वो जिन बादलों से होकर गुजरी,
वो बादल धुआं होते गए।
जब चांद चूमकर लौटी वो,
तो सोचा घर को लौट चलें,
ये उड़ान थी बहुत थकानभरी,
चलो उसी घोंसले में आराम करें।
उस धुंए की तीरगी में मगर,
वो जंगल कहीं खो गया,
सिर्फ इमारतें थी अब हर तरफ,
वो जंगल भी इमारत हो गया।
हवा नहीं थी अब सन्नाटे थे,
उस नदी की जगह सड़क पक्की थी,
कुछ लोग अब भी कहते हैं,
वो चिड़िया ही 'तरक्की' थी।

- आदर्श जैन

शक्कर हैं!

बातें उसकी बात नही हैं, शक्कर हैं। सोच उसे जो गज़ल कही हैं, शक्कर हैं। बाकी दुनिया की सब यादें फीकी हैं, उसके संग जो याद रही हैं, शक्कर हैं।...